महाभारत के इस अत्यंत भावुक और निर्णायक प्रसंग में, जब पांडव और कौरवों के बीच युद्ध निश्चित दिखाई देने लगा, तब धर्म की रक्षा और विनाश को रोकने के लिए स्वयं श्री कृष्ण संधि दूत बनकर हस्तिनापुर की सभा में पहुंचे। उनका उद्देश्य केवल एक था — किसी भी प्रकार महायुद्ध को रोकना और दोनों पक्षों के बीच शांति स्थापित करना।
सभा में उपस्थित भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, विदुर और कृपाचार्य जैसे महान योद्धा जानते थे कि यदि युद्ध हुआ तो पूरा आर्यावर्त विनाश की आग में जल उठेगा। श्री कृष्ण ने धृतराष्ट्र और दुर्योधन को समझाते हुए कहा कि पांडव केवल अपना अधिकार मांग रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि उन्हें केवल पांच गांव भी दे दिए जाएं, तो युद्ध टल सकता है।
लेकिन अहंकार में डूबे दुर्योधन ने श्री कृष्ण की एक भी बात मानने से इंकार कर दिया। उसने क्रोधित होकर कहा कि वह सुई की नोक जितनी भूमि भी पांडवों को नहीं देगा। इतना ही नहीं, दुर्योधन ने श्री कृष्ण को बंदी बनाने का भी प्रयास किया। तभी पूरी सभा में एक अद्भुत चमत्कार हुआ।
श्री कृष्ण ने अपना विराट रूप धारण कर लिया। उनके भीतर सम्पूर्ण ब्रह्मांड दिखाई देने लगा। देवता, ग्रह, नक्षत्र और अनंत शक्तियां उनके दिव्य स्वरूप में समाहित थीं। यह दृश्य देखकर सभा में बैठे सभी लोग स्तब्ध रह गए। भीष्म पितामह और विदुर ने folded hands के साथ भगवान को प्रणाम किया, लेकिन दुर्योधन का अहंकार फिर भी नहीं टूटा।
इस प्रकार शांति का अंतिम प्रयास भी असफल हो गया और महाभारत के महान युद्ध की नींव पूरी तरह तैयार हो गई। आने वाले समय में कुरुक्षेत्र की भूमि पर ऐसा युद्ध होने वाला था, जिसे दुनिया युगों तक याद रखेगी।
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